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नर्क में बिताए वो लम्हे

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दिल्ली के करनाल बाईपास की भूल-भुलैया में ऐसे उलझे कि वापिस आने के लिए डिवाईडर पर कट ढूंढते-2 अलीपुर जा पहुंचे। वहां से यू टर्न लिया। गंदे नाले के किनारे चलते-चलते वापिस करनाल बाईपास पहुंचे। यहां एक बहुत ही बड़ा कूड़े का पहाड़ दिखाई दिया और उस पर टहलते कुछ लोग। पीछे बैठा अ‍ेंल्ल बोला ‘ अदिति ! ये कूड़ा बीनने वाले लोग हैं जो यहां से खाना ढूंढते हैं!’
‘नहीं ये मजदूर हैं, जो यहां इस पहाड़ पर कूड़े को साइड में कर रहे हैं। ’ इतना कहकर मैंने कैमरे के जूम में से उन लोगों को देखना शुरू कर दिया। उनमें से एक हाथ में मुझे लिफाफा दिखा तो मैं चौकी कि कहीं अमन की बात सही तो नहीं? मैंने ड्राईवर को कहा कि इस कूड़े के पहाड़ पर ले चलो। ड्राईवर थोड़ा सा हिचकिचाया, पर मैंने उसे दृढ़ता से कहा तो उसने गाड़ी पहाड़ की तरफ मोड़ दी। घुमावदार चढ़ाई से जैसे-जैसे हम पहाड़ पर चढ़ रहे थे, वैसे-वैसे दिल्ली नीचे जा रही थी। ऊपर एक जगह पहुंचकर ड्राईवर ने कहा कि गाड़ी आगे नहीं जाएगी। जाती भी कैसे, हम उस कूड़े के ढ़ेर के पहाड़ की चोटी पर पहुंच चुके थे। वहां कूड़ा ही कूड़ा और उसमें मुंह मारते कौवे, चील, कुत्ते, गाय व भिन-भिनाती मक्खियां हमारे स्वागत के लिए गाड़ी से बाहर तैयार खड़ी थी। दृश्य देख कर वहां उतरने को दिल सा नहीं किया, पर मन मारकर गाड़ी का दरवाजा खोलना ही पड़ा। जैसे ही दरवाजा खोला तो तीखी बदबू का एक तूफान सा अंदर आ घुसा। सबके मुंह से एक साथ निकला यककक!!! और दरवाजा बंद कर दिया। सभी एक-दूसरे के मुंह की ओर देखने लगे, जैसे कह रहे हों कि कहां फंस गए? मैं ही इन सब को लेकर आयी तो मैंने दिल मजबूत करके दरवाजा फिर खोला और एकदम से नीचे उतर गयी । अमन भी मेरे पीछे-पीछे उतर गया। पर बाकी दोनों साथियों ने फिर दरवाजे बंद कर लिए। बाहर सबसे पहले मक्खियों ने हमें परखा। चील, कौवे सिर पर मंडराने लगे। कुत्ते पूंछ और कान उठाकर शक की नजर से हमें निहारने लगे तो गाय चुपचाप पूंछ हिलाती रही। कैमरा लिए हम आगे बढ़े, जहां मानव इन जानवरों के साथ ही ढेर में हाथ-पांव मार रहे थे। इतनी भयानक बदबू से जिंदगी में पहली बार पाला पड़ा था। उल्टी आने को हो रही थी। थोड़ा आगे चलकर वो दृश्य भी आंखों के आगे आ गया जो करनाल बाईपास से गाड़ी में बैठे-बैठे देखा था। आदमी, महिलाएं, बच्चे, बच्चियां सब थैला उठाए उस कूड़े के ढेर में जल्दी-जल्दी हाथ-पांव चला रहे थे। मानो अलग ही दुनिया में पहुंचे गए हम दोनों। लग रहा था जैसे कोई बाजार लगा है यहां। लोग वही हाथ कचरे में मार रहे थे और उन्हीं हाथों से अपना पसीना पौंछ रहे थे। फिर कुछ ने जेब से लिफाफा निकाला और उन्हीं हाथों से वहां बैठकर चावल भी खाने लगे। अमन ने एक लड़के से पूछा, ‘क्या ढूंढ रहे हो यहां?’ लड़का बोला-‘सब कुछ ढूंढ रहे हैं जी। लिफाफे, कपड़े, खाना। बाबू जी सब कुछ तो है यहां पे।’
अमन ने फिर पूछा,‘नाम क्या है तेरा?’
‘सलम अली! मेरी मां, बहन, भाई सभी यहीं हैं साहब।’
तभी कूड़े से भरा एक ट्रक आया और पहाड़ पर मौजूद 50-60 लोग एक साथ उस पर टूट पड़े।
मैं फोटो खींचने लगी तो वहां कार्यरत बेलदार हमारी तरफ भागा-भागा आया।
‘ मैडम जी! परमिशन है आपके पास यहां फोटो खींचने की?। यहां कैसे आ गयी आप?’
मैंने पूछा,‘ जो लोग यहां कूड़ा बीन रहे हैं क्या इनके पास परमिशन है?’ जबाव में उसने थूक गिटका और बोला,‘ मैडम हमने थाने में कई बार रिपोर्ट किया, पर ये लोग मानते हैं नहीं और आ जाते हैं धक्के से।’
मैंने पूछा, ‘कौन से थाने में! थानेदार कौन है?’
‘अब जाने दीजिए न मैडम , रोजी-रोटी है बेचारों की।’ बेलदार गिड़गिड़ाया।
‘ आपका नाम क्या है?’ अमन ने पूछा।
‘जी मेरा नाम नंदलाल है।’ उसने सकपकाते हुए बताया।
‘ ये लोग कूड़े से खाना तक उठाकर खा जाते हैं । कल को इनको कोई बीमारी हो गई तो? ’ अमन ने थोड़ा तलख लहजे में पूछा ।‘साहब! गरीबी से बड़ी बीमारी और क्या लगेगी इनको। ये बीमारियां तो अमीरों को लगती होती हैं साहब! हमने कभी इनमें से किसी को बीमार हुए नहीं देखा।’ नंद लाल ने कहा।
हम नंदलाल से बतिया रहे थे और लोग कूड़े के ट्रक को लूटने में मग्न थे। कुछ लोग अपने-अपने छोटे-छोटे बच्चों को लेकर भी आए हुए थे और वो बच्चे वहीं ढेर पर बैठे वहीं से कुछ उठा-उठाकर खा रहे थे। दृश्य ही ऐसा था कि कुछ और देर वहां हमारा खड़े रहना दुभर हो गया। हम जल्द वापिस चले और दरवाजा खोलकर गाड़ी में घुस गए। वहां पहले से ही मौजूद दोनों साथियों का बुरा हाल था और बार-बार रूम फ्रैशनर का स्प्रे करके वो लोग वहां टिके हुए थे। हमारे आते ही हम वापिस चल दिए। पहाड़ से उतरते वक्त अमन बोला- ‘ अदिति ये लोग कभी नर्क में नहीं जाएंगे।’
मैंने कहा ‘क्यों? ’
‘क्योंकि ये तो पहले से ही नर्क में जी रहे हैं।’

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